Wednesday, 17 February 2016

मनुष्य की कीमत

लोहे की दुकान में अपने पिता के साथ काम कर रहे एक बालक ने अचानक ही अपने पिता से पुछा – “पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की क्या कीमत होती है ?”
पिताजी एक छोटे से बच्चे से ऐसा गंभीर सवाल सुन कर हैरान रह गये.
फिर वे बोले “बेटे एक मनुष्य की कीमत आंकना बहुत मुश्किल है, वो तो अनमोल है.”
बालक – क्या सभी उतना ही कीमती और महत्त्वपूर्ण हैं ?
पिताजी – हाँ बेटे.
बालक कुछ समझा नही उसने फिर सवाल किया – तो फिर इस दुनिया मे कोई गरीब तो कोई अमीर क्यो है? किसी की कम रिस्पेक्ट तो कीसी की ज्यादा क्यो होती है?
सवाल सुनकर पिताजी कुछ देर तक शांत रहे और फिर बालक से स्टोर रूम में पड़ा एक लोहे का रॉड लाने को कहा.
रॉड लाते ही पिताजी ने पुछा – इसकी क्या कीमत होगी?
बालक – 200 रूपये.
पिताजी – अगर मै इसके बहुत से छोटे-छटे कील बना दू तो इसकी क्या कीमत हो जायेगी ?
बालक कुछ देर सोच कर बोला – तब तो ये और महंगा बिकेगा लगभग 1000 रूपये का .
पिताजी – अगर मै इस लोहे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो?
बालक कुछ देर गणना करता रहा और फिर एकदम से उत्साहित होकर बोला ” तब तो इसकी कीमत बहुत ज्यादा हो जायेगी.”
फिर पिताजी उसे समझाते हुए बोले – “ठीक इसी तरह मनुष्य की कीमत इसमे नही है की अभी वो क्या है, बल्की इसमे है कि वो अपने आप को क्या बना सकता है.”
बालक अपने पिता की बात समझ चुका था .

अक्सर हम अपनी औरदुसरो के सही कीमत आंकने मे गलती कर देते है. हम मनुष्य की वर्तमान परिस्थिति को देख कर इन्सान का मुल्तोका मुल्यांकन करने लगते है. लेकिन हर मनुष्य में हमेशा अथाह शक्ति होती है. हर मनुष्य का जीवन हमेशा सम्भावनाओ से भरा होता है. जीवन मे कई बार स्थितियाँ अच्छी नही होती है पर इससे मनुष्य की कीमत नही लगाई जा सकती है. मनुष्य के रूप में हमारा जन्म इस दुनिया मे हुआ है इसका मतलब है हरमनुष्य बहुत ख़ास और महत्वपूर्ण हैं . हर मनुष्य को हमेशा अपने आप को लोहे के रड से कील कील से सुई बनना चाहिये और अपनी सही कीमत प्राप्त करने की दिशा में बढ़ते रहना चाहिये.

Tuesday, 9 February 2016

लावारिश

लावारिश
ALOK CHANDAN·WEDNESDAY, FEBRUARY 10, 2016
आज शाम में एक दुर्घटना को देखा जो एक 60 साल के उम्र के बुजुर्ग के साथ हुआ,जब तक कुछ समझता मै वो काल के गाल में शमा गया था,
खैर मुझे क्या मै भी ओर्रो की तरह अपने काम मे निकल गया पर मैने सोचा एक बार देख तो लू|इस 4 करोड़ आबादी वाले मतलबी शहर में एक लावारिश लाश का क्या होता है|जब पास गया और देखा एक पुलिस वाले ने उसको रिक्शे पर उठवा के दो लोगो को कहा वही लेजाकर भैक दे| मैने उनसे पूछा ये कौन थे उसने कहा लावारिश और चल दिया|पर वो था हमारे जैसा चलता फिरता इन्सान जिसका पता भी था और वारिश भी|
वो जोनपुर (उ.प्र) से 14 जनवरी को डेल्ही आया था| जिसे उसके ही बेटे नै घर से निकल दिया और वो अपने पेट की खातिर महानगर आ पंहुचा,
जहा आते ही उसे भीख मागने को मजबूर होना था, पर वो मेहनती था|
उसने लोगो से काम माँगा और किसी ने उसे 1000 विजिटिंग कार्ड बाटने को दे दिया बदले मे खाना देगा का वादा किया मैने तब उसे देखा था की क्या है जिन्दगी| विसिटिंग कार्ड भी लोग लेना नही चाह रहे थे|

किसी नै हाथ हटा लिया किसी ने गाली दे दिया और फिर भी वो बाटता रहा क्यूंकि सवाल था भूख का; जो कुछ नही समझता है सिवाए भोजन के। क्यूंकि 7 करोड़ आबादी दुनिया की आज भी भुखी रहती है (DATA BY WHO) जिसको खाना नही मिलता उसमे ये भी था, मेरे आँखों के सामने और उसे मै रोज देखता था| इस ठण्ड मे वो METRO के निचे रोज सोता और सुबह किसी से कार्ड ले कर और अपनी बहुमूल्य बैग जिसमे उसके कम्बल और चादर था
आलोक चन्दन